रायपुर(एचकेपी 24 न्यूज)। प्राचीन काल से किसी की भी मृत्यु होने पर परिवार के पुरुष ही श्मशान घाट ले जाकर अंतिम संस्कार करते हैं। महिलाओं को सिर्फ घर के भीतर रहकर तेरहवीं तक मृतक के नाम पर रुदन (रोने) का ही अधिकार है। यहां तक कि गंगा में अस्थियां विसर्जित करने अथवा दशगात्र, क्रियाकर्म, हवन-पूजन में भी महिलाओं को दूर ही रखा जाता है। इस परंपरा को सोनकर समाज ने तोड़कर मिसाल पेश की है।रायपुर की सात बेटियों को अंतिम संस्कार कार्यक्रम में शामिल होने का अधिकार देकर सोनकर समाज ने एक नई परंपरा की शुरुआत की है। इस पहल का संपूर्ण समाज ने स्वागत किया है। किसी परिवार में बेटा नहीं है तो बेटियां भी अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठा सकती हैं।भीम नगर रायपुर निवासी 65 वर्षीय रामखिलावन इंदोरिया की मृत्यु 1 अप्रैल की शाम को हुई। उनकी सात बेटियां हैं। इन बेटियों को उन्होंने बेटों की तरह पाला। लंबी बीमारी के दौरान रामखिलावन ने समाज के लोगों के समक्ष इच्छा जाहिर की थी कि जब भी उनकी मौत हो तो श्मशानघाट तक बेटियां ही कंधा देंगी और मुखाग्नि समेत अंतिम संस्कार की सारी रस्में निभाएंगी।पिता की अंतिम इच्छा का सम्मान करते हुए रिश्तेदारों एवं सोनकर समाज के प्रमुख लोगों ने तमाम रीति-रिवाज और पूर्वाग्रहों को दरकिनार करते हुए बेटियों के हाथों पिता का अंतिम संस्कार करने की अनुमति दे दी। इस तरह समाज ने महिला सशक्तिकरण और बेटी बचाओ आंदोलन को आगे बढ़ाने की पहल की है।मृतक की सातों बेटियों योगेश्वरी, अनिता, ममता, मनीषा, संगीता, सरिता, आशा ने अपने पिता के शव को महादेव घाट स्थित मुक्तिधाम तक कंधा दिया। श्मशानघाट में अंतिम संस्कार की सारी रस्मों को पूरा किया। एक साथ मुखाग्नि भी दी। इस पहल का अन्य समाज ने भी स्वागत किया है।सामाजिक चुनाव में भी मिले हिस्सेदारी छत्तीसगढ़ सोनकर नवचेतना मंच ने उम्मीद जाहिर की है कि जिस तरह देश का प्रधानमंत्री चुनने में आधी आबादी यानी महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उसी तरह समाज के पदाधिकारी चुनने में भी महिलाओं को शीघ्र ही मतदान करने का अधिकार मिलेगा।
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