बीजापुर(एचकेपी 24 न्यूज)। रंगों का पर्व होली एक दिन बाद पूरे देश में उल्लास के साथ मनाया जाएगा। लेकिन जिला मुख्यालय से करीब 50 किमी दूर बसा रानीबोदली गांव इस दिन मातम में डूबा रहेगा। दरअसल, 15 मार्च 2007 को देश के पहले सबसे बड़े नक्सली हमले की दास्तां आज भी यहां के ग्रामीणों के जेहन में कैद है। पुलिस के पचपन जवानों की शहादत का मंजर अपनी आंखों से देख चुके यहां के लोग होली की खुशियों के बीच खुद को सदमे में पाते हैं।रानीबोदली कैंप में मौजूद 56 जवान रात को जब गहरी नींद में सो रहे थे, रात करीब एक बजे नक्सलियों ने हमला कर दिया था। हमला करने वालों में करीब पांच सौ नक्सली थे। इससे कैंप में हड़कंप मच गया था। हमलावर नक्सलियों ने पहले तो मोर्चे पर तैनात जवानों को अपना निशाना बनाया। उसके बाद कमरों में सो रहे जवानों को बाहर से बंद कर अंदर पेट्रोल बम फेंककर निशाना बनाया। इस हमले में 55 जवान शहीद हुए थे। इनमें से ज्यादातर जवान सीएएफ व एसपीओ के थे। जवानों की जवाबी कार्रवाई में नौ नक्सली भी मारे गए थे।वर्ष 2005 में सलवा जुडूम शुरू होने के बाद राहत शिविर में आए हुए ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए जगह-जगह कैंप स्थापित कर जवानों की तैनाती की गई थी। रानीबोदली भी उसी का हिस्सा था। बताते हैं कि इस घटना से तीन दिन पहले ही जवानों ने हर्षोल्लास के साथ होली का पर्व मनाया था। इस घटना के 12 साल बाद भी यहां के ग्रामीणों उस मंजर को याद कर सिहर उठते हैं।रानीबोदली के ग्रामीण बताते हैं कि इस हमले में उसने भी अपने दो भाइयों को खोया है। जिस रात यह हमला हुआ था, उस दिन वह अपने घर पर ही सोया हुआ था। अचानक गोलियां की आवाज सुनकर जब वह उठा तो देखा कि कैंप के अलावा पूरे गांव में सैकड़ों नक्सली फैले हुए थे। यही नहीं, नक्सली कैंप की चहारदीवारी पर सीढ़ियां लगाकर जवानों पर ताबड़तोड़ गोलियां चला रहे थे। तकरीबन दो घंटे तक चले इस खूनी खेल के बाद नक्सली चले गए।अस्सी परिवारों वाले इस गांव में नक्सली दहशत के चलते आज भी सुविधाएं नहीं पहुंच पाई हैं। यहां की कच्ची सड़क पर इक्का-दुक्का गाड़ियां ही चलती हैं। एकमात्र बस ही ग्रामीणों व कैंप में तैनात जवानों के आवागमन का साधन है। अस्पताल, एंबुलेंस कुछ भी नहीं है। कुटरू से महज आठ किमी दूर बसे रानीबोदली की चर्चा आज भी नक्सली हमले की वजह से होती है।
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